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बाढ कटान पीडितों का दर्द भरा सवाल,गरीबी और बेबशी की जात और धर्म नहीं होती है साहब !!!

रिपोर्ट : कुंवर अजय सिंह "मन्टु"

बाढ कटान पीडितों का दर्द भरा सवाल,गरीबी और बेबशी की जात और धर्म नहीं होती है साहब इसलिए कोई हमारी मदद नहीं कर रहा !!!

 

रिपोर्ट : कुंवर अजय सिंह “मन्टु”

बलिया/उप्र ।  तस्वीरें सब कुछ बयान कर देती हैं लेकिन कुदरत की कहर का दर्द समझाने के लिए शब्दों की आवश्यक्ता पडती हैं जनाब। ऐसी ही कुदरत के कहर का दंश झेल रहे उप्र के जनपद बलिया के तहसील क्षेत्र बैरिया के ग्राम पंचायत गोपालपुर के दुबेछपरा और उदई छपरा गांव की हालात हैं जहां पर कुदरत का कहर इस तरह टुट गया जैसे कोई भयंकर प्रलय जैसा हो !

     दुबेछपरा में रिंग बंधा कटने से गंगा नदी का मुख्य धारा दुबेछपरा की तरफ हो जाने से चारों तरफ पानी से घीरे बाढ कटान पीडितों में दहशत भर गई और लोग अपने अपने घरों से बदहवास होकर जरुरत सामानों को लेकर भाग रहे थे वहीं एक परिवार के सदस्य और बच्चे किसी तरह पानी से बाहर निकलकर जान बचाई। एक तरफ लोग आनन-फानन में भाग रहे थे तो दुसरी तरफ किसी तरह एक मां अपने नवजात बच्चे को गोद में उठाकर बाढ के पानी से बाहर निकलकर जान बचा रही थी और आनन फानन में सुरक्षित जगह पलायन के लिए जरुरत के सामानों को ट्रैक्टर की ट्राली में रखकर जाते हुए उन मां की आंखों में दहशत और बेबसी को साफ-साफ पढा जा सकता हैं लेकिन उसके लिए मानवता की आवश्क्ता होती हैं जो हमारे यहां जिन्हें सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी दी जनता ने,वे सभी लोग लाश को नोचकर अपनी भुख मिटाने वाले गिद्धों से भी ज्यादा गैर निकले। 

                 बाढ कटान पीडितों का सवाल कि गरीबी और बेबशी की जात और धर्म नहीं होती है साहब !!! इसलिए हमारी कोई सुनने वाला नहीं हैं । बस जिस ईश्वर ने हमें उजाडा हैं वहीं कही ना कहीं बसा भी देंगे !

    बाढ कटान पीडितों की पीडा का कवरेज करने वाले कैमरामैन व पत्रकारों का भी रुह कांप रहा हैं उनकी बेबशी और उनकी आंखों में हजारों आक्रोशित सवलों को पढकर मानों जैसे तडपते हुए अधमरी लाशों की ढेर के उपर चलने जैसा हो ! 

   ऐसा नहीं हैं कि सरकार अपनी जनता को सहयोग व बचाने के लिए धन और संसाधन मुहैया नहीं कराती हैं बल्कि जनप्रतिनिधियों,ठेकेदार व सरकार के अधिकारी व कर्मचारीयों की मिलिभगत से वो बजट का सौव रुपये का एक हिस्सा यानि एक रुपये तक जनता तक नहीं पहुंचने देते उसी का परिणाम आज जनता भुगत रही हैं।

     बहरहाल चाहे जो भी कुछ हो जाएं “अपना काम बनता भाड में जाए जनता” वाली फंडा पर बाढ विभाग राहत कार्य कर रही हैं और नेता लोग अपनी अपनी फोटोशाप और सेल्फी की दुकान खोले बैठे हैं कि कौन कितना और किस तरह अपना वोट भुना लें। चुनाव सिर पर हैं और नेताओं का आरोप – प्रत्यारोप देखकर ऐसा लग रहा हैं बाढ राजनितिक स्टंट बनता जा रहा हैं। यहां बाढ पीडितों की मदद भी एक राजनितिक छलावा बनकर रह गई हैं ।

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